आइए जाने अपने बीकानेर । के बारे में

बी राजस्थान का एक जिला है। जो थार के मरुस्थल के बीच में स्थित है। यह एक गर्म जिला है , यहां का तापमान गर्मी में 45 डिग्री के आसपास रहता है। 

बीकानेर
बीकानेर की स्थापना राव बीका जी द्वारा 1488 ईस्वी में की गई थी इसका प्राचीन नाम जांगल प्रदेश था यहां के राजा को "जांगल बादशाह" कहा जाता था बीकानेर राजस्थान के उत्तर-पश्चिम में स्थित है। बीकानेर की सीमा पाकिस्तान से 168 km लगती है।जो राजस्थान के सभी जिलों में से कम है। बीकानेर का कुल क्षेत्रफल लगभग 27000वर्ग किलोमीटर है। ।

बीकानेर में दर्शनीय स्थल 

मुकाम(नोखा)
यह नोखा में स्थित एक गांव है। जहां विश्नोई समाज के देवता जाम्भोजी द्वारा समाधी ली गई है। यहां प्रतिवर्ष फाल्गुन मास की अमावस्या को मेला भरता है।ये पर्यावरण विभाग पशु-पक्षियों के रक्षक थे इनके  समाज में आज भी पशु-पक्षियों का संरक्षण किया जाता है।

देशनोक(बीकानेर)
 यह मां करणी का मंदिर है। यहां सफेद और काले रंग के चुहे पाये जाते हैं। सफेद चूहों को काबा कहते हैं। यहां प्रतिवर्ष नवरात्र में मेला भरता है। देश के विभिन्न भागों से श्रद्धालु आते हैं। यहां की मान्यता है कि सफेद चूहों को देखने के बाद अगर चील दिखाई दे तो बहुत शुभ माना जाता है।

कोलायत मेला
यह मेला कपिल मुनि की तपस्या करने के कारण यहां पर पर मनाया जाता है। यह मेला प्रतिवर्ष कार्तिक मास को मनाया जाता है। और पुर्णिमा के दिन स्नान को प्रमुख माना जाता है। यहां पर आटे के दीप जलाकर अपनी मनोकामना पूरी करते है। यहां पर प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु आते हैं। 

जसनाथजी(कतरियासर)
यह मेला कतरियासर में जसनाथी संप्रदाय द्वारा प्रतिवर्ष आयोजित किया जाता है। इस मेले में अग्नि नृत्य किया जाता है। इनके 36नियम होते है। जो पर्यावरण और पशु पक्षियों के संरक्षण के बारे लौंगो में जागरूकता फैलाते है। इस के भक्त अधिकतर जाट होते है।अन्य जाति के लोग भी शामिल होते है। 

जुनागढ़(बीकानेर)
यह किला बीकानेर में स्थित है और इस किले को राजस्थान के किलों का जेवर कहा जाता है। इस किले की स्थापना राव राय सिंह द्वारा की गई थी 1589-1594के बीच बनकर तैयार हुआ। इस किले के चारों ओर सुरक्षा की दृष्टि गहरी खांईयां बनाई गई है। इस गढ़ के पुर्व और पश्चिम दरवाजों को कर्णपोल और चांदपोल कहते हैं। 

राष्ट्रीय ऊंट अनुसंधान केन्द्र(बीकानेर)
यह बीकानेर में ऊंटों के संरक्षण के लिए स्थापित किया गया है।  ऊंट की नस्ल का पूरा ध्यान रखा जाता है।

कृषि 
यहां पर वर्षा बहुत ही कम होती है । नलकूप अधिक है।
नहर के द्वारा सिंचाई की जाती है। इस कारण यहां पर अधिक वृक्ष नहीं है,केवल खेजड़ी के वृक्ष है। वर्षा के कारण यहां घास उग जाती है। इनमें भुरट घास अधिक
पाती जाती है। 

पशुपालन
यहां पर गाय,भैंस, बकरी, भेड़ पाली जाती है। घास अधिक होने के कारण यहां पर ये पशु अधिक पाले जाते
है। ऊंट यहां का सबसे बड़ा पशु है। इससे खेत जोतते है सवारी ढोने, बोझा ढोने के लिए काम में लिया जाता है।


तापमान 
यहां तापमान गर्मी में 45 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच जाता है। 

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